Sunday, April 21, 2019

Essay in hindi on रविवार | Sunday holiday पे हिंदी में निबंध (लेख ) Nibandh lekh

 रविवार हर सप्ताह विद्यार्थियों के लिए या सरकारी ,निजी सभी क्षेत्रों में कार्य करने वाले नौकरी पेशा लोगों के लिए  हों या घर में प्रतिदिन गृहणियों  के लिए जो घरेलू कामकाज में हमेशा व्यस्त रहती हैं I  उन सभी के लिए हर सप्ताह रविवार की  छुट्टी का शुभ संदेश  और खुशियां लेकर आता है और फिर चला जाता हैI  इस दिन लोग अपने रोजमर्रा जिंदगी से छुट्टी पाते  हैं चाहे विद्यार्थी हो या दफ्तरों में काम करने वाले सरकारी बाबू  चाहे भोजन पकाते पकाते और घरेलू कामकाज देखते -देखते घर में  ही प्रतिदिन  बिताने  वाली गृहणियां , उस दिन रविवार एक खुशियां की तरह है लोग उस दिन प्रतिदिन वाले कामकाज को छोड़कर कुछ अलग और नया करते हैं जिससे उनकी नीरसता कम हो जाती हैI  हम स्कूल में पढ़ते हो या कॉलेज में ऑफिस में काम करते हो या कल -कारखानों में सभी लोग रविवार की इंतजार बेसब्री से करते हैं क्योंकि इस दिन काम करने वालों को एक  दिन  की छुट्टी मिलती  है जिसमें वह अपने घर से कहीं और पार्क में खेल मैदान में और जो दूर रहते हैं उन्हें अपने परिवार के साथ घर में समय बिताने का मौका मिलता है I 

Essay in hindi on रविंद्र नाथ टैगोर | Ravindra Nath Taigore पे हिंदी में निबंध (लेख ) Nibandh lekh

भारत देश में महान विभूतियों  सन्यासियों   और न जाने कितने महापुरुषों का जन्म हुआ है, जिन्होंने  हमेशा ऐतिहासिक गौरव के साथ -साथ  देश  का नाम गर्व  से ऊंचा किया है I  उन्हीं रत्नों में से एक रत्न थे रविंद्र नाथ टैगोर ,जिनका जन्म 7 मई 1861 को हुआ था इनके पिताजी का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर था जो बहुत बड़े धार्मिक गुरु  थे,जो  अपने  बुद्धिमता और ईमानदारी  के लिए सभी जगह जाने जाते थेI रविंद्र नाथ टैगोर जी का परिवार  बहुत बड़ा था, उनके देखभाल करने के लिए बहुत सारे नौकर और सहयोगी  हुआ करते थे जो बचपन में उनके भाई बहनों का देखभाल किया करते थे I परंतु नौकर और सहयोगी बच्चों के इतने अच्छे से देखभाल नहीं कर पाते थे जिनको यह कार्यभार सौंपा गया था उन्हें बच्चों के खेल  और   नटखट कार्यों  की इतनी आजादी नहीं दी गई थी I अतः आप  कह  सकते हैं  की रविंद्र नाथ टैगोर का घर एक जेल के समान था जहां कड़े अनुशासन का पालन करना पड़ता था उन्हें घर से बाहर जाकर खेलने की आज्ञा नहीं थी और ना ही बाहर के दोस्तों के साथ शरारत करने की ,जिसके कारण  बच्चे अपने साथ ही खेल कर संतुष्टि और खुश रहते थेI रविंद्र नाथ टैगोर अपने विद्यालय के जीवन  में  भी उन्हें खेलने की स्वतंत्रता स्कूल के द्वारा नहीं दी जाती थी , इसीलिए उन्होंने विद्यालय छोड़ दिया और अपने घर से ही प्रमुख रूप से शिक्षा ग्रहण करने लगे I