Sunday, April 21, 2019

Essay in hindi on रविंद्र नाथ टैगोर | Ravindra Nath Taigore पे हिंदी में निबंध (लेख ) Nibandh lekh

भारत देश में महान विभूतियों  सन्यासियों   और न जाने कितने महापुरुषों का जन्म हुआ है, जिन्होंने  हमेशा ऐतिहासिक गौरव के साथ -साथ  देश  का नाम गर्व  से ऊंचा किया है I  उन्हीं रत्नों में से एक रत्न थे रविंद्र नाथ टैगोर ,जिनका जन्म 7 मई 1861 को हुआ था इनके पिताजी का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर था जो बहुत बड़े धार्मिक गुरु  थे,जो  अपने  बुद्धिमता और ईमानदारी  के लिए सभी जगह जाने जाते थेI रविंद्र नाथ टैगोर जी का परिवार  बहुत बड़ा था, उनके देखभाल करने के लिए बहुत सारे नौकर और सहयोगी  हुआ करते थे जो बचपन में उनके भाई बहनों का देखभाल किया करते थे I परंतु नौकर और सहयोगी बच्चों के इतने अच्छे से देखभाल नहीं कर पाते थे जिनको यह कार्यभार सौंपा गया था उन्हें बच्चों के खेल  और   नटखट कार्यों  की इतनी आजादी नहीं दी गई थी I अतः आप  कह  सकते हैं  की रविंद्र नाथ टैगोर का घर एक जेल के समान था जहां कड़े अनुशासन का पालन करना पड़ता था उन्हें घर से बाहर जाकर खेलने की आज्ञा नहीं थी और ना ही बाहर के दोस्तों के साथ शरारत करने की ,जिसके कारण  बच्चे अपने साथ ही खेल कर संतुष्टि और खुश रहते थेI रविंद्र नाथ टैगोर अपने विद्यालय के जीवन  में  भी उन्हें खेलने की स्वतंत्रता स्कूल के द्वारा नहीं दी जाती थी , इसीलिए उन्होंने विद्यालय छोड़ दिया और अपने घर से ही प्रमुख रूप से शिक्षा ग्रहण करने लगे I 

टैगोर जब  16 वर्ष के थे तब इंग्लैंड  जाना हुआ जहां उन्होंने अंग्रेजी साहित्यिक एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था वहां उनकी मुलाकात देश -विदेश से आए प्रख्यात विद्वानों से हुआ वह खुद वहां रुककर महान लेखक विलियम शेक्सपियर के कुछ प्ले अर्थात नाटक देखा  और अध्ययन किया Iउन्होंने  इंग्लैंड में करीब 1 वर्ष बिताया जहां उन्होंने खुद को प्रकृति सौंदर्य से प्रेम और साहित्य के प्रति लगाव रखने रखने लगेI  उन्होंने स्वयं अध्ययन कर बहुत से ऐसे ही बातों और वहां की संस्कृति की बारे में जाना जिससे अपने पिता की तरह वह भी एक  विद्वान के रूप में सक्षम हो गए थे I  
 चुकी वह प्रकृति के बहुत बड़े प्रेमी हो गए थे, उन्हें स्वच्छ पर्यावरण और एकांत पल बिताना बहुत ही अच्छा लगता थाI  उन्हें वहां से एक अलग ऊर्जा और ज्ञान की आभास होती थी जब भी इस तरह के स्थान पर होते हमेशा फुले नहीं समाते, इसके साथ- साथ वह वहां से रचना भी करते और उन्हें धीरे- धीरे काफी कविताएं लिखने और पढ़ने में रूचि लगने लगीI  वहां से उन्होंने काफी कम उम्र में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था  जो काफी प्रसिद्ध और सभी लोग के द्वारा उन्हें प्रोत्साहन मिलता, टैगोर ने अपनी जीवनी में लिखा है कि जब उनके पिता इसके बारे में जाना तो उन्होंने अपने बेटे को बुलाकर काफी तारीफ की और प्रोत्साहित किया उन्होंने बोला अगर तुम्हें  इस कार्य के प्रति प्यार है तो तुम एक दिन बहुत ही महान कवि बनोगे और ऐसा ही हुआ रविंद्र नाथ टैगोर न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व विख्यात बने I  वह पहला एशियाई कवि थे जिनको नोबेल पुरस्कार से  सम्मानित किया गया I  एक कवि के रूप में ,एक साहित्यकार के रूप में जो हर भारतीय के लिए गर्व का समय बन गयाI उन्होंने  आश्रम अध्ययन करने के लिए आरंभ  करवाया था उसे शांतिनिकेतन कहा जाता था जहां पर खुले मैदान में वृक्षों की छाया के नीचे ताजगी  हवा के साथ विद्या दी जाती थी जहां अगल-बगल सभी जगह एक स्वच्छ वातावरण फैला हुआ था उसे शांतिनिकेतन के रूप में खुद रविंद्र टैगोर ने स्थापना किया और एक गुरु के रूप में अपने शिष्य को शिक्षा भी दिया बाद में यह एक प्रख्यात विश्वविद्यालय हो गया जिसका वर्तमान में नाम विश्व भारती है I  टैगोर  भारत में नहीं ही पूरे एशिया के प्रथम व्यक्ति  थेI    जिन्होंने 1913 में नोबेल पुरस्कार जैसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से नवाजा गया और यह पुरस्कार उनके प्रसिद्ध पुस्तक गीतांजलि के लिए दिया गया जिसमें बहुत सारे मीठे और ऐसी कविताएं का संग्रह है जिनका सामाजिक ,साहित्यिक काफी मायने रखता हैI  वह पूरे विश्व में महान कवियों में से एक थे उनकी व्यक्तित्व सिर्फ कवि और एक गुरु के रूप में ही नहीं बल्कि वह अनेक रूप में जाने जाते थेI 
 उन्होंने  अपने अभिनय, चित्रकारी, नाटक और संगीत के प्रति भी उनका गहरा रुचि रखते थेI उनको  राजनीति में भी काफी रुचि रखते थे उन्हें 1915 में अंग्रेजी सरकार द्वारा नाइटहुड की पदवी से सुशोभित किया गया था जिसको उन्होंने लौटा  दिया , जालियांवाला बाग हत्याकांड जो पूरे भारतीय के लिए दुर्भाग्यपूर्ण घटना था  इसके कारण उन्होंने यह उपाधि लौटा दिया इन्होंने ऐसा कर अपने देश के प्रति प्रेम और निष्ठा को दर्शाया उन्हें गुरुदेव का उपाधि गांधी जी के द्वारा मिला I सर्वप्रथम गांधी जी उनको गुरुदेव कहकर  बुलाते थेI  वह हमेशा विदेश में भ्रमण करने में रुचि लेते थे वह अपने कविता के माध्यम से अपने देश के सेवा के लिए बहुत सारे कार्य किए जिससे लोगों में एक देश भक्ति की और अपने देश के प्रति प्यार निष्ठा बनी रहे उनकी लेखनी वाकई में एक जादू थी जो हर वर्ग के उम्र के लोगों को पसंद आता  था I 
दुर्भाग्यपूर्ण 7 अगस्त 1941 को गुरुदेव ने अंतिम सांस ली यह महान कवि हमेशा के लिए  देश के अमर हो गये  I 

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