Tuesday, January 22, 2019

Essay in Hindi on झांसी की रानी | Jhansi ki Rani पे हिंदी में निबंध (लेख ) Nibandh lekh

                    
भारत हमेशा से ही वीरता और विद्वानों के लिए प्रसिद्ध हैI  भारत एक शांतिप्रिय देश है जहां आपसी प्रेम और अहिंसा के साथ- साथ अनुशासन लोगों के रग-रग में बसा हुआ है, यहां के लोग जितने परिश्रमी वह दयालु हैं शायद ही कहीं देखने को मिले ,यहां अतिथियों को भगवान माना जाता है  परंतु जब भी कोई बाहरी आक्रमण भारत पर बुरी नजर डालता है तो उन्हें ईंट  का जवाब पत्थर से दिया जाता है I  देशसेवा और राज्यधर्म के लिए लोग नि:स्वार्थ रूप से अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं, ऐसे वीर-वीरांगनाओं की परिचय देना भारत में  सूर्य को दीया दिखाने के समान है क्योंकि भारत में वीर-वीरांगनाओं कि ऐसी अनेको कथाएं हैं जिन्होंने अपने देश स्वराज के रक्षा करते हुए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दियाI 

 इन्हीं में से एक वीरांगना थी महारानी लक्ष्मीबाई, भारत में नारियों को देवी के समान माना जाता है यहां उनकी पूजा होती है और कहा जाता है कि जिस घर में नारी का निवास न हॊ वह घर कभी पवित्र नहीं हो सकता I जब-जब धरती पर अत्याचार हुआ तब -तब देवी का प्र्चन्ड रूप देखने को भी मिला वह किसी न किसी रूप में दैत्यों  का नरसंहार की, महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 को वाराणसी के निकट भदैनी में हुआ था उनकी माता का नाम भागीरथी बाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे  था ,जो एक मराठी ब्राह्मण थे और मराठा शासक बाजीराव के सेवा में थे I उनकी मां अध्यात्मिक और बुद्धिमान थी अपने माता- पिता के दुलारी रानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था लोग उन्हें प्यार से मनु भी  बुलाते थेI  मणिकर्णिका की बहुत ही छोटी उम्र में ही मां का साया छूट गया उनके बचपन में ही माता की मृत्यु हो गई इसलिए उनका लालन -पोषण देखभाल  करने की पूरी जानकारी उनके पिता पर आ गयाI उनके पिता ने पेशवा के दरबार में मणिकर्णिका को भी साथ लेकर जाने लगे शुरू से ही अपनी चंचलता एवं बुद्धिमता से वह  दरबार की लोकप्रिय बन गईं , प्यार से बाजीराव पेशवा ने उन्हें छबीली नाम दियाI लक्ष्मीबाई ने शस्त्र और शास्त्र दोनों में ही परंपरागत हासिल की, 1842 में उनका विवाह झांसी नरेश के साथ हुआ

 जिनका नाम गंगाधर राव था जो शिवराव बाबू के पुत्र थेI  जो बहुत ही अनुभवी एवं कुशल शासक थे, विज्ञान ,संस्कृति  और कला के प्रेमी थेI जब मनु  झांसी आई तब उनका नाम देवी लक्ष्मी के तर्ज पर लक्ष्मीबाई रखा गया I  घुड़सवारी और  तलवारबाजी के शौकीन हमेशा ही लक्ष्मीबाई रही थीं I   गंगाधर राव ने उनके इस कुशलता के प्रशंसक थे ,जब वे बीमार थे तो राज-काज के सारे जिम्मेदारी लक्ष्मीबाई को सौंप दी दुर्भाग्यपूर्ण उनकी जल्दी ही मौत हो गई ,कहा जाता है कि ईश्वर उसी का अधिक परीक्षा लेता है जो वीर एवं यशस्वी हो  पति से पूर्व उनकी संतान की मृत्यु हो गई थी जिसकी अवस्था महज 4 माह का था दुर्भाग्यपूर्ण वह विधवा भी हो गई I उनके पति के मृत्यु के बाद योग्य उत्तराधिकारी अभी वर्तमान में कोई न था जिसको सत्ता का जिम्मेदारी सौंपा जाए, गंगाधर राव ने अपने जीवन- काल में ही भतीजे दामोदर राव को गोद लिया था उनकी उम्र अभी बाल्यकाल  की थी लक्ष्मीबाई उनको उत्तराधिकारी घोषित कर खुद संरक्षक बन गयीं मगर उस समय अंग्रेजों को यह रास नहीं आया उन्होंने राज्य हड़प नीति के तहत नई चाल चली और दामोदर राव को उत्तराधिकारी अस्वीकार करते हुए रानी लक्ष्मी बाई को पेंशन का प्रलोभन देकर झांसी पर कब्जा करना चाहा परंतु वीर लक्ष्मीबाई ने प्रस्ताव को ठुकरा दी और अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करने के लिए खुद सिहासन का प्रधान बनी और वीरता पूर्वक झांसी की रक्षा का संकल्प लिया I वह अपने राज्य के स्वतंत्रता तथा प्रजा के भलाई के लिए अपने जीवन को भी बलिदान कर दिया उन्होंने सभी शासकों  को जो अंग्रेजों से लोहा लेना चाहते थे एकजुट किया और ब्रिटिश सैन्य  शक्तियों से युद्ध के लिए अपनी सेना को पूर्ण निर्माण किया I  सैनिकों को उन्होंने राजधर्म ,देशभक्त का गुर सिखाने के साथ- साथ आर्थिक ,शैक्षणिक रूप से प्रशिक्षित भी किं , रानी लक्ष्मीबाई के गुण के साथ -साथ सौंदर्य के लिये प्रसिद्ध  थी वह काफी दयालु भी थीं I  कहा जाता है कि नारी जब अपना प्रचंड रूप और शक्ति प्रदर्शन करती है तो हर ताकतवर योद्धाओं  को झुकना पड़ता है सर्वप्रथम अंग्रेजों ने ऐसी गलती की झांसी के कम सैनिकों और एक औरत को युद्ध करते देख जल्दी खुश हुए पर  रानी लक्ष्मीबाई ने उनके हर एक आक्रमण का वीरता पूर्वक और डटकर मुकाबला कियाI  जिनसे  अंग्रेजों को आभास हो गया कि यह कोई मामूली योद्धा नहीं , 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए और अपने बच्चे को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों से मुकाबला कियाI  झांसी 1857 के संग्राम का प्रमुख केंद्र बन गया जहां हिसा भड़क उठी थी पर रानी के इस वीरता को देख कर हर वह शासक जो अंग्रेजों की खिलाफ थे इस संग्राम में उनका सहयोग दियाI  रानी ने कई आक्रमणों  को सफलतापूर्वक विफल कर दिया 

 अंततः दो हफ्तों के बाद ब्रितानी सरकार ने झांसी पर कब्जा कर लिया परंतु रानी लक्ष्मीबाई वहां से अंग्रेजों को चकमा देकर निकल गयीं , तात्या टोपे और विद्रोही सैनिकों के  साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लियाI  18 जून 1858 को ग्वालियर के पास अंग्रेजी सेना से लड़ते -लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गयीं  और और हम अनाथ हो गए, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई का जीवन आज भी हमारे प्राणों में नया जोश, देशभक्ति बढाता है ,कहा जाता है की महान लोगों की केवल शरीर  ही मरता है परंतु उनकी आत्मा अमर रहती हैI  रानी लक्ष्मी बाई देशवासियों के लिए प्रिय  और भी आज भी अमर हैं I उनकी बहादुरी और समर्पण की कथाएं हमेशा इतिहास के पन्नों पर चमक बिखेरती और हर इंसान को प्रेरणा देती रहेगी I 

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